भिलाई (https://cgaajtak.com/)। छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय की बीजेपी सरकार सुशासन तिहार मना रही है। सुशासन तिहार में लोगों का क्या भला हो रहा है, सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है या नहीं यह अलग बात है। सरकार के सुशासन तिहार के विपरीत सीजी हाउसिंग बोर्ड द्वारा अवैध निर्माण का मामला सामने आया है। सरकारी एंजेसी हाउसिंग बोर्ड चारागाह की जमीन पर कॉलोनी का निर्माण कर रहा है। यदि कोई बिल्डर या निजी एजेंसी ऐसा करते तो तत्काल कार्रवाई हो जाती किंतु यहां मामला उलटा है। अवैध निर्माण कोई और नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल (सीजी हाउसिंग बोर्ड) करवा रहा है। क्या इस मामले में सरकार कोई कार्रवाई करेगी या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा, यह अहम सवाल है?
दरअसल मामला दुर्ग जिले के पाटन विधानसभा के ग्राम सेलूद का है। यहां पर हाउसिंग बोर्ड द्वारा चारागाह की लगभग 10 एकड़ जमीन पर कॉलोनी बनाया जा रहा है। निर्माण और योजना लागू करने के पहले हाउसिंग बोर्ड ने न तो पंचायत और न ही चारागाह समिति से अनुमति लेना उचित समझा। योजना लागू कर सीधा निर्माण शुरू कर दिया है।
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हाउसिंग बोर्ड की भूमिका
बता दें कि छत्तीसगढ़ राज्य हाउसिंग बोर्ड की भूमिका सरकारी कॉलोनाइजर की है। उनका काम निजी बिल्डर की तरह कॉलोनी का निर्माण कर स्थानीय निकाय ( नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत ) को सौंपना है। कॉलोनी निर्माण के बाद उनकी भूमिका समाप्त हो जाती है। पानी, बिजली, साफ सफाई और टैक्स की जिम्मेदारी निकायों की हो जाती है।
चारागाह की जमीन के बदले नहीं दी कोई जमीन
ग्रामीणों ने बताया कि हाउसिंग बोर्ड ने गांव की 10 एकड़ में कॉलोनी निर्माण के बदले चारागाह के लिए कोई जमीन नहीं दी है। लैंड यूज (भू-परिवर्तन) भी नहीं कराया है। इस हिसाब से पूरी कॉलोनी का निर्माण अवैध रूप से हो रहा है।
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गांव की 15 एकड़ जमीन सरकारी योजना की भेंट चढ़ी
गांव की लगभग 15 एकड़ चारागाह की जमीन सरकारी योजना की भेंट चढ़ गई है। 10 एकड़ जमीन हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी और लगभग साढ़े 4 एकड़ भारत माला परियोजना के तहत निकल गई है। भारत माला परियोजना सड़क निर्माणी एजेंसी ने भी न तो अधिगृहित जमीन के बदले कोई दूसरी जमीन दी न मुआवजा दिया। सड़क का निर्माण तो सरकारी काम और सार्वजिनक है लोगों के काम आएगा किंतु हाउसिंग बोर्ड तो मुख्त की जमीन पर कॉलोनी बनाकर करोड़ों रुपए कमाई करेगा। दोनों के उद्देश्य और काम की प्रवित्ति में जमीन आसमान का अंतर है। गांव में सड़क नाली जैसे छोटे छोटे मुद्दों पर राजनीति करने वाले स्थानीय नेताओं की इस मामले में चुप्पी समझ से परे है। ग्रामीण सवाल उठा रहे है कि इस मामले में दोनों पार्टी के नेताओं की चुप्पी रा राज क्या है? कमीशन की मजबूरी या कोई और कारण !
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तालपुरी में भी इसी तरह का मामला
तालपुर इंटर नेशनल कॉलोनी भिलाई में इस तरह का मामला आया है। यहां निर्माण पूरा होने के बाद कॉलोनी नगर निगम को हस्तांतरित हो चुका है। कॉलोनी हस्तांतरण के बाद हाउसिंग बोर्ड का दायित्व/अधिकार खत्म हो गया है। इसके बाद भी बिना लैंड यूज परिवर्तन किए कॉलोनी में शापिंग कॉम्प्लेक्स के लिए जगह चिन्हित कर दी गई है, जबकि कॉलोनी हस्तांतरण के बाद कोई अधिकार नहीं है। जिसका तालपुर कॉलोनी की रेसीडेंट्स सोसायटी विरोध कर रही है।
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल है कि क्या प्रोजेक्ट रद्द होगा। यदि नहीं तो गलत प्रजोक्ट बनाने वाले विभागीय अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी। अब-तक हुए खर्च की वसूली उनके वेतन से की जाएगी। इस प्रजोक्ट को लेकर ऐसे कई सवाल उठ रहे हैं।
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लैंड यूज चेंज का यह है नियम
चारागाह (गोचर) की जमीन का भू-परिवर्तन (Land Use Change) सामान्यतः प्रतिबंधित है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में जिला कलेक्टर या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से इसे अन्य सार्वजनिक उपयोग (जैसे स्कूल, अस्पताल) के लिए बदला जा सकता है। ग्राम पंचायत के प्रस्ताव और नियमानुसार वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने पर ही यह परिवर्तन संभव है।
प्रक्रिया: ग्राम पंचायत की सिफारिश/प्रस्ताव आवश्यक है।
वैकल्पिक भूमि: यदि चारागाह भूमि का उपयोग किया जाता है, तो कानून के अनुसार उतने ही क्षेत्रफल की बंजर या अन्य सरकारी भूमि को चारागाह (गोचर) के रूप में चिन्हित करना आवश्यक है।
अतिक्रमण: चारागाह भूमि पर अतिक्रमण गैरकानूनी है, जिसे हटाने का अधिकार तहसीलदार/SDM को है।
अदालत का रुख: सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, चारागाह भूमि का उपयोग केवल निर्धारित उद्देश्यों के लिए ही किया जाना चाहिए।

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